Tuesday, June 8, 2010

सोच नाथू राम गोड्स की



सोच नाथू राम गोड्स की
जीवित रहना महात्मा गांधी का,
ठीक नहीं था, देश और खुद उनके सेहद के लिए.
आज सरेआम वलात्कार की जा रही है,
उनके सपनों के भारत की,
भर्ष्टाचार के बुलडोजर से .
मिटा दी गई है,
राम राज्य की निशानी,
अतिक्रमण का नाम देकर.
नहीं देख सकते थे हकीकत,
अपने सपनों के भारत की.
सांसे रुक जाती, जब होता,
मासूमों के साथ वलात्कार.
रूह कांप उठाता देखकर,
गरीबों का नरसंहार.
पूजा करते मंदिरों में......
अनसन करते, संसद के सामने.
हो सकता है, बेचैन आत्मा,
संसद भवन के पास भटकती,
मुक्ति के इन्तजार में.
कितना आगे था, सोच
नाथू राम गोड्स की,
जो भारत का वलात्कार होने से पहले,
कर दी, पवित्र आत्मा को मुक्त,
सदा के लिए...........

मैं कवि नहीं हूँ


मैं कवि नहीं हूँ,
क्योंकि कोई भी गुण
नहीं है हमारे अन्दर
जो होता है,
एक कवि में.
न तो दिखने में ही
कवि लगता हूँ,
और कवियो वाली पोशाक भी
नहीं पहनता.
फिर भी न जाने क्यों?
ऐसा लगता है,
दिल के कोई कोने में,
छुपा है.....
मेरा कवि मन.
जो चाहता है,
मुझे कवि बनाना.
उसके अन्दर दृढ इच्छा है,
कठोर परिश्रम है,
जो बदल देगा,
मेरा बजूद.
हाँ देखना एक दिन
वह जरुर बदल देगा,
और ला खड़ा करेगा,
मुझे........
भविष्य में कभी
कवियों की लम्बी लाईन में.

मैं डरता हूँ,......



मैं डरता हूँ,
कविता से....
शायद रूठ न जाए,
मेरी कोई हरकतों से.
अब तो इस डर ने,
डरने की सीमा पार कर गई है.
रात भर जागा रहता हूँ
ऐसा न हो की,
कविता...
रूठ कर चली जाए,
हमारे सोने के बाद.
कभी पलक झपकती भी
तो पुकारता हूँ,
कविता-कविता......
कई बार तो पूछ बैठा हूँ,
अपनी माँ से,
चली तो नहीं गई
कविता...?
कविता की डर ने
जुदा कर दिया हमें...
गीता से रामायण को
अब हाथ भी नहीं लगाता,
शायद..
नहीं चाहती कविता
बातें करूँ मैं,
किसी और से.
या फिर,
मेरी मुलाक़ात हो,
किसी और के साथ.
वह तो चाहती है
अपना बनाना
मुझे......
सिर्फ अपनाना,
कविता का सागर.

वह तितली


उड़ने की कोशिश में,
नाकामयाव......
उसकी पंखो को,
कुतर दी गई है,
बंदिस रूपी खंजर से.
चाहती थी वह,
उड़ना.....
अनंत तक
चहकना.....
अरमानो के मुडेर पर,
फुदकना.....
दिल की आँगन में.
स्वर्ण पिंजरा को छोड़कर,
उड़ने के लिए
खुले आकाश में.
चाहत की दरवाजे को,
पार कर जाना चाहती थी,
वह तितली.

Sunday, June 6, 2010

मिक्स वेज सब्जी


जब कभी आप ये फैसला नही कर पायें, कि आज कवि की थाली में कौन सी सब्ज़ी लानी है, तो फिर बात मिक्स वेज सब्जी (Mixed Vegetable) तक जा पहुंचती है. आइये आज हम मिक्स वेज सब्जी बनायें.

आवश्यक सामग्री

* कविता के दाने - 100 ग्राम ( एक छोटी कटोरी )
* कवि की बात - 100 ग्राम
* गजल - 100 ग्राम
* कहानी - 1 मीडियम आकार की
* मगही गाने - 1 मीडियम आकार की
* भोजपुरी गाने - 2 मीडियम आकार की ( यदि आप चाहें )
* भोजपुरी सिनेमा - 1 मीडियम आकार की
* फ़िल्मी गाने - 1/2 रील का लम्बा टुकड़ा

विधि
सभी को थोड़ां-थोड़ां सुन लीजिये. kahaani को 1 सेमी. के क्यूब्स में काट लीजिये. फ़िल्मी गाने, और गजल को मिक्सी से मिक्स कीजिये. डी वि डी प्लयेर में सी.डी डाल कर चालू कीजिये. अब कवि की बात का पेस्ट डालकर तब तक सुनिए जब तक कि कान न पक जाय. अब कविता खोल कर, धीरे-धीरे 6-7 मिनिट तक पढ़िए. भोजपुरी सिनेमा को खोलकर देखिये, सब्जी अभी नरम नहीं हुई है. अगर आपको लगे कि सब्जी को पकने के लिये, भोजपुरी गाने की आवश्यकता है, तो 2 भोजपुरी गाने मीडियम आकार की डाल कर, सब्जी को ढककर फिर से धीमी आवाज में 3-4 मिनिट तक सुनिए.अब आप सब्जी को खोलकर देखिये, वे नरम हो गयीं हैं. सब्जी में मगही गाने 1 मीडियम आकार की ऊपर से डाल कर मिला दीजिये. आपकी मिक्स वेज सब्जी तैयार है.
मिक्स वेज सब्जी को कवि सम्मलेन में निकालिये. माइक के ऊपर डाल कर सजाइये. गरमा गरम मिक्स वेज सब्जी कवि एवं और लोगों को, जोश के साथ परोसिय और खाइये.

Saturday, March 13, 2010

मेरी कविता ..

सोच कविता बोल कविता
बज रहा वह ढोल कविता
नदी कविता पेड़ कविता
खेत का हर मेड कविता
दाये कविता बाये कविता
जिधर देखो उधर कविता
फिर भी मई ढुं ढं ता हूँ
गई मेरी किधर कविता ..